पंकज त्रिपाठी
इंडियन सिनेमा के बेहतरीन अभिनेताओं में शुमार पंकज त्रिपाठी आज अपनी सादगी, नेचुरल एक्टिंग और गहरी अदाकारी की वजह से लोकप्रिय हैं. छोटे-से गांव से निकलकर बड़े पर्दे तक का उनका सफर बेहद दिलचस्प है. ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से पहली बार उन्हें मेनस्ट्रीम सिनेमा में नोटिस किया गया था. इस फिल्म में वो सुल्तान की भूमिका में दिखाई दिए थे जो लिखा तो किसी और के लिए गया था लेकिन पंकज त्रिपाठी को ही उसे निभाना था सो उनकी झोली में आ ही गया.
सुल्तान ने बदल दी पंकज त्रिपाठी की जिंदगी
कई सालों के संघर्ष और छोटी-मोटी भूमिकाओं के बाद पंकज त्रिपाठी को फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' में एक छोटा सा किरदार मिला था. वह इस मौके से खुश थे लेकिन उन्हें शायद ही पता था कि किस्मत ने उनके लिए कुछ बड़ा लिख रखा है. इसके किरदार 'सुल्तान' को किसी और अभिनेता को दिया गया था, उसके साथ शूटिंग शुरू हो चुकी थी और कुछ सीन शूट भी हो गए थे. लेकिन निर्देशक अनुराग कश्यप उसकी एक्टिंग से संतुष्ट नहीं थे.
उन्हें लग रहा था कि 'सुल्तान' में जो गहराई और क्रूरता चाहिए, वह पर्दे पर नहीं आ पा रही है. अनुराग कश्यप एक नए अभिनेता की तलाश में थे. एक दिन जब वे सेट पर थे उन्होंने अचानक देखा कि पंकज त्रिपाठी जो एक छोटे से सीन के लिए तैयार हो रहे थे, बिलकुल शांत खड़े थे. उनकी आंखें और उनका अंदाज बहुत कुछ कह रहा था. उनकी आंखों में वह ठंडक और गंभीरता थी जो 'सुल्तान' के किरदार के लिए एकदम सही था.
फिर क्या था, अनुराग कश्यप ने तुरंत पंकज त्रिपाठी को बुलाया और उनसे पूछा, 'क्या तुम यह रोल कर सकते हो?' पंकज त्रिपाठी ने बिना सोचे-समझे हां कर दी और यह उनके सालों के इंतजार और तैयारी का नतीजा था. उन्होंने तुरंत उस किरदार की गहराई को समझा और एक अभिनेता के रूप में अपनी पूरी प्रतिभा झोंक दी. जब उन्होंने 'सुल्तान' के रूप में पहला शॉट दिया तो सेट पर हर कोई दंग रह गया. उनकी आवाज, उनकी आंखें और उनका क्रूर अंदाज इतना प्रभावशाली था कि अनुराग कश्यप ने तुरंत उन्हें फाइनल कर दिया.
किरदार से ऑडियंस के मन में छोड़ी छाप
'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के दोनों भाग एक ब्लॉकबस्टर हिट साबित हुए और पंकज त्रिपाठी का 'सुल्तान' का किरदार दर्शकों के दिलों में बस गया. उनकी क्रूरता, शांत स्वभाव और दमदार संवाद ने उन्हें रातों रात एक लोकप्रिय चेहरा बना दिया. इस एक किरदार ने उनके करियर की दिशा पूरी तरह से बदल दी और उन्हें एक ऐसे अभिनेता के रूप में स्थापित किया, जिसने अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर बॉलीवुड में अपना मुकाम बनाया.
वेब सीरीज 'मिर्जापुर' में कालीन भैया बनकर उन्होंने पूर्वांचल के बाहुबली का रूप दिखाया, तो 'क्रिमिनल जस्टिस' में माधव मिश्रा जैसे चतुर मगर दिल के अच्छे वकील बन ओटीटी पर छाए.'स्त्री' के रुद्र भैया का चंदेरी पुराण वाला ज्ञान और कमाल की कॉमेडी ने खूब हंसाया, तो 'सेक्रेड गेम्स' के रहस्यमयी गुरुजी ने हमें उलझाया.
'बरेली की बर्फी' में बेटी को समझने वाले पिता और 'मसान' में एक मासूम रेलवे कर्मचारी के किरदार में पंकज ने हमारी आत्मा को छुआ. उनकी अदाकारी ऐसी है कि वो हर रोल में इस कदर ढल जाते हैं कि लोगों को उनमें अपनी झलक दिखाई देती है.
100 रुपये रिश्वत केस, 39 साल बाद इंसाफ, हाईकोर्ट फैसला, आरोप गलत
कभी-कभी जिंदगी इतनी बेरहम होती है कि एक झूठा आरोप इंसान को पल-पल मार देता है. छत्तीसगढ़ में एक व्यक्ति पर महज 100 रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगा. मुकदमा चलता रहा और उसने अपनी जवानी, परिवार और समाज में इज्जत सब खो दी. 39 साल की लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार हाईकोर्ट ने साफ कर दिया- "आप बेगुनाह हैं." लेकिन सवाल यह है कि इतने लंबे वक्त तक जो जिंदगी कैद में और आरोपों के बोझ तले गुजरी, पत्नी गुजर गई, बच्चे बर्बाद हो गए, उसकी भरपाई कौन करेगा?
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जागेश्वर प्रसाद को बरी करते हुए कहा कि आप निर्दोष हैं. इस फैसले ने न सिर्फ न्यायिक प्रणाली की धीमी रफ्तार पर सवाल खड़े कर दिए हैं बल्कि यह कहानी इंसान की जिंदगी बर्बाद करने का जीता-जागता सबूत है. आप पर लगाया गया आरोप पूरी तरह से झूठा और आधारहीन था. न्याय मिलने के बाद 83 साल के जागेश्वर प्रसाद का कहना है कि अब मैं इस न्याय का क्या करूं. विभाग के ही एक कर्मचारी के झूठे आरोप ने मेरी नौकरी छीन, परिवार छीन लिया, जिंदगी पर झूठ आरोप का कलंक जेल के अंदर ढोता रहा. क्या ये न्याय है?
रायपुर में रहने वाले 83 साल के जागेश्वर प्रसाद के अनुसार 1986 में 100 रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगा था. इस आरोप ने उनकी नौकरी, उनका परिवार और उनका सम्मान सब कुछ छीन लिया. पीड़ित ने की सरकार से पेंशन और आर्थिक मदद की मांग की है. जरा सोचिए, एक व्यक्ति अपने जीवन के 39 साल एक झूठे रिश्वत के मामले के खिलाफ लड़ता रहा और अपनी पूरी जिंदगी निकाल दी. न्याय मिलने के बाद जागेश्वर प्रसाद ने सरकार से बकाया पेंशन और आर्थिक मदद की मांग कर रहे हैं, जिससे वह अपने आगे का जीवन सुकून से बिता सकें.
कब लगा था रिश्वत का आरोप?
ये घटना साल 1986 की है, जब जागेश्वर प्रसाद मध्य प्रदेश स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन के रायपुर कार्यालय में बिल सहायक के पद पर काम करते थे. एक अन्य कर्मचारी अशोक कुमार वर्मा ने उन पर अपना बिल बकाया पास कराने के लिए दबाव डाला. जिसके बाद जागेश्वर ने नियमों का हवाला देते हुए बकाया बिल पास करने से मना कर दिया. अगले दिन वर्मा ने 20 रुपये की रिश्वत देने की कोशिश की, लेकिन जागेश्वर ने वो भी वापस कर दिए.
100 रुपये के लिए हुई थी जागेश्वर की गिरफ्तारी
इसके बाद 24 अक्टूबर 1986 को भी वर्मा ने जागेश्वर को 100 रुपये (50-50 की दो नोट) की रुपये की रिश्वत देने की कोशिश की. इसी दौरान विजिलेंस टीम ने छापा मारा और जागेश्वर प्रसाद को रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया. जागेश्वर ने दावा किया कि ये गिरफ्तारी एक सोची समझी साजिश है. गिरफ्तारी के दौरान जागेश्वर के हाथ केमिकल से धुलवाए गए और नोट को सबूत के तौर पर पेश किया गया. इस दौरान जागेश्वर अपने निर्दोष होने की दुहाई देते रहे लेकिन किसी ने एक नहीं सुनी.
1988 से 1994 तक रहे निलंबित
इस घटना ने जागेश्वर प्रसाद का पूरा जीवन बर्बाद कर दिया. वह 1988 से 1994 तक वे निलंबित रहे, फिर रीवा स्थानांतरित कर दिए गए और उनका वेतन भी आधा कर दिया गया, प्रमोशन और इंक्रीमेंट भी रूक गए. चार बच्चों के साथ पूरे परिवार को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा. पूरे समाज ने जागेश्वर के परिवार को रिश्वतखोर का परिवार कहकर अपमानित किया. स्कूल में फीस जमा नहीं होने के कारण बच्चों की पढ़ाई भी रूक गई. पड़ोसियों ने भी पूरे परिवार से बात करना बंद कर दिया.
जिंदगी बेजार वाली देरी
वहीं, रिटायरमेंट के बाद जागेश्वर की पेंशन भी बंद कर दी. अपना घर चलाने के लिए उन्होंने चौकीदारी और छोटे मोटे काम किए. इस पूरे मामले ने न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. एक मामूली रिश्वत केस में इंसाफ दिलाने में 39 साल लगना अपने आप में बड़ी त्रासदी है. इस दौरान आरोपी की नौकरी, समाज में उसकी पहचान और उसका परिवार सबकुछ दांव पर चला गया.
न्यायिक सुधार की जरूरत
विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे मामले न्यायिक सुधार की सख्त जरूरत को रेखांकित करते हैं. अगर आप समय रहते सुनवाई होती, तो एक निर्दोष व्यक्ति की जिंदगी इस तरह बर्बाद नहीं होती.
रिंग पहनते ही भावुक हो गईं सपा सांसद
टीम इंडिया के क्रिकेटर रिंकू सिंह और सपा सांसद प्रिया सरोज ने सगाई कर ली है।
जब रिंकू सिंह ने प्रिया को रिंग पहनाई, तो सपा सांसद emotional हो गईं। उन्होंने X पर एक भावुक पोस्ट लिखते हुए कहा- 'ये दिन हमारे दिलों में लंबे समय से बसा है। करीब 3 साल से हर पल इस दिन का इंतजार था। अब सगाई- पूरे दिल से और हमेशा साथ रहने के लिए हो गई'। लगभग 3 साल के बाद रिंकू-प्रिया की लव-स्टोरी पूरी हुई और दोनों ने अपनी नई जिंदगी का न्यू चैप्टर शुरू किया। अभी दोनों का मिलन अधूरा है, क्योंकि दोनों की शादी अभी होना बाकी है। रिंकू-प्रिया की शादी की तारीख पहले ही सामने आ चुकी हैं। इस खूबसूरत कपल की शादी 18 नवंबर को तय की गई है। शादी में विराट कोहली, शाहरुख खान, गौतम गंभीर, रोहित शर्मा जैसे दिग्गजों के शादी समारोह में शामिल होने की उम्मीद है।
रिंग सेरेमनी में दिग्गज नेता रहे मौजूद
रिंग सेरेमनी में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, सांसद डिंपल यादव, कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला, रामगोपाल यादव, जया बच्चन जैसे नेता मौजूद रहे।
कैसे हुई थी लव-स्टोरी की शुरुआत
रिंकू और प्रिया एक साल से अधिक समय से एक दूसरे को जानते हैं। दोनों की मुलाकात एक कॉमन दोस्त के पिता के जरिये हुई थी। हालांकि, धीरे-धीरे रिंकू और प्रिया की दोस्ती हुई जो प्यार में बदल गई। प्रिया सरोज के पिता तूफानी सरोज ने बताया था कि प्रिया की रिंकू से मुलाकात एक कॉमन दोस्त के जरिये हुई थी जिसके पिता भी एक क्रिकेटर हैं। अब दोनों एक दूसरे के जीवनसाथी बनने जा रहे हैं। प्रिया सरोज उत्तर प्रदेश के मछलीशहर से सपा की सांसद हैं। उन्होंने 2024 लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के कैंडिडेट को हराया था।
रिंकू सिंह आइपीएल में केकेआर से खेलते हैं। 2023 के आईपीएल में गुजरात के खिलाफ एक मैंच में रिंकू सिंह ने यश दयाल के एक ओवर में 5 छक्के मारे थे. तभी से रिंकू सिंह एक चर्चित चेहरा बन गए। रिंकु 2024 के सीजन में चैंपियन टीम का हिस्सा भी थे।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़
अयोध्या राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के सालों बाद भी बहसथमने का नाम नहीं ले रहा है. हाल ही में यह मामला तब और चर्चा में आया जब पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ पर आरोप लगे कि उन्होंने फैसले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने घर बुलाया. अब चंद्रचूड़ ने पहली बार फैसले की निष्पक्षता पर उठे सवालों का जवाब दिया.
साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने अयोध्या विवाद पर सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए राम जन्मभूमि पर राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया. इस फैसले के बाद पूरे देश में इसे ऐतिहासिक करार दिया गया. हाल के दिनों में राजनीतिक हलकों और सोशल मीडिया पर यह चर्चा चली कि पूर्व CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ ने फैसले के बाद पीएम मोदी को अपने घर बुलाया था. इसको लेकर न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए.
चंद्रचूड़ ने अपनी सफाई में क्या कहा?
एक निजी चैनल के कार्यक्रम में पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने अब पहली बार चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला किसी दबाव, राजनीति या प्रभाव में नहीं बल्कि सबूत और संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर हुआ था. उन्होंने कहा कि अदालत का दायित्व सिर्फ न्याय करना है और वही हुआ.
नियमों के दायरे में फैसला
पूर्व CJI ने दोहराया कि राम मंदिर पर दिया गया फैसला सिर्फ कानूनी दस्तावेजों, पुरातत्व साक्ष्यों और दलीलों के आधार पर दिया गया था. व्यक्तिगत संबंध या मुलाकातों का इससे कोई लेना-देना नहीं है.
चंद्रचूड़ का बयान अहम क्यों?
डीवाई चंद्रचूड़ का यह बयान ऐसे समय आया है जब विपक्ष लगातार इस मुद्दे पर न्यायपालिका और सरकार के बीच कथित सांठगांठ का आरोप लगाता रहा है. ऐसे में उनकी सफाई न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को दोबारा रेखांकित करती है.उन्होंने कहा,"सीजेआई विपक्ष का नेता नहीं, सिस्टम का ही अंग है. मुझे कोई संकोच नहीं है कि मैं हिंदू हूं. संविधान किसी धर्म के विरोध की बात नहीं करता. जज किसी भी धर्म का हो, वह जब कोर्ट जाता है तो जस्टिस ही करता है. जहां तक पीएम मोदी को आमंत्रित करने के लिए आलोचना की बात है, तो सीजेआई विपक्ष के नेता नहीं हैं. वह भी सिस्टम के अंग हैं और यह एक शिष्टाचार है."
अखिलेश में मेरे आवास पर आए थे
पूर्व सीजेआई ने आगे कहा, 'साल 2014 में मेरी माता जी का निधन हुआ था. तब मैं इलाहाबाद में था. उस समय अखिलेश यादव यूपी के सीएम थे, वह भी तब मेरे आवास आए थे. मुझसे मुलाकात कर शोक व्यक्त किया था. पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने आगे कहा कि मैं हिंदू हूं और मुझे मेरा धर्म किसी भी धर्म की प्रार्थना की इजाजत देता है.